शुद्धचिद्रूपसद्धयानभानुरत्यंतनिर्मलः ।
जनसंगतिसंजातविकल्पाब्दैस्तिरोभवेत् ॥7॥
'मैं शुद्ध चिद्रूप' ध्यान रूपी, सूर्य अति निर्मल सदा ।
जन संगति से व्यक्त चिन्ता, रूपि घन से नित ढ़का ॥३.७॥
अन्वयार्थ : यह शुद्धचिद्रूप का ध्यानरूपी सूर्य, महानिर्मल और देदीप्यमान है । यदि इस पर स्त्री, पुत्र आदि के संसर्ग से उत्पन्न हुये विकल्परूपी मेघ का पर्दा पड़ जायगा तो यह ढँक ही जायगा ।