
अभव्ये शुद्धचिद्रूपध्यानस्य नोद्भवो भवेत् ।
वंध्यायां किल पुत्रस्य विषाणस्य खरे यथा ॥8॥
ज्यों बाँझ के सुत नहीं, खर के सींग नहीं नहीं कभी ।
त्यों शुद्ध चिद्रूप तत्त्व, ध्यानादि अभव्यों के सभी ॥३.८॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार बांझ के पुत्र नहीं होता और गधे अर्थ के सींग नहीं होते, उसी प्रकार अभव्य के शुद्धचिद्रूप का ध्यान कदापि नहीं हो सकता ।