
दूरभव्यस्य नो शुद्धचिद्रूपध्यानसंरुचिः
यथाऽजीर्णविकारस्य न भवेदन्नसंरुचिः ॥9॥
जैसे अजीर्ण विकार युत, की नहीं भोजन में रुचि ।
त्यों दूर भव्यों के नहीं, चिद्रूप शुध की ध्यान रुचि ॥३.९॥
अन्वयार्थ : जिसको अजीर्ण का विकार है उसकी जिसप्रकार अन्न में रुचि नहीं होती, उसी प्रकार जो दूरभव्य है उसकी भी शुद्धचिद्रूप के ध्यान में प्रीति नहीं हो सकती ॥९॥