+ भेद-ज्ञान के बिना शुद्ध चित् रूप का ज्ञान सम्भव नहीं -
भेदज्ञानं विना शुद्धचिद्रूपज्ञानसंभवः ।
भवेन्नैव यथा पुत्रसंभूतिर्जनकं विना ॥10॥
ज्यों पिता बिन पुत्रोत्पत्ति, जगत में सम्भव नहीं ।
त्यों भेदज्ञान बिना नहीं है, शुद्ध चिद्रूप ज्ञान भी ॥३.१०॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार कि पुरुष के बिना स्त्री के पुत्र नहीं हो सकता, उसी प्रकार बिना भेद-विज्ञान के शुद्धचिद्रूप का ध्यान भी नहीं हो सकता ।