
तत्तस्य गतचिंता निर्जनताऽऽसन्न भव्यता ।
भेदज्ञानं परस्मिन्निर्ममता ध्यानहेतवः ॥12॥
चिन्ता-रहित, एकान्त-स्थल, भेद-ज्ञान रु भव्यता ।
परिपाक अति ही निकट, हेतु ध्यान के निर्मोहता ॥३.१२॥
अन्वयार्थ : इसलिये यह बात सिद्ध हुई कि चिन्ता का अभाव, एकान्त स्थान, आसन्न भव्यपना, भेदविज्ञान और दूसरे पदार्थों में निर्ममता ये शुद्धचिद्रूप के ध्यान में कारण हैं बिना इनके शुद्धचिद्रूप का कदापि ध्यान नहीं हो सकता ॥१२॥