
नृस्त्रीतिर्यग्सुराणां स्थितिगतिवचनं नृत्यगानं शुचादि
क्रीड़ाक्रोधादि मौनं भयहसनजरारोदनस्वापशूकाः ।
व्यापाराकाररोगं नुतिनतिकदनं दीनतादुःखशंकाः
श्रृंगारादीन् प्रपश्यन्नमिह भवे नाटकं मन्यते ज्ञः ॥13॥
नर नारि तिर्यग् देव की, स्थिति गति वचनादि को ।
नृत्य गान शोकादि हँसी, क्रीड़ा रुदन क्रोधादि को ॥
भय मौन निद्रा बुढ़ापा, व्यापार आकृति स्तुति ।
दुख दीनता पीड़ा नमन, श्रंगार भोजन रोग भी ॥
इत्यादि बहुविध परिणति, को देख वास्तविक स्थिति ।
ज्ञाता समझता नाटकों सम, जगत की ये प्रवृत्ति ॥३.१३॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य ज्ञानी है - संसार की वास्तविक स्थिति का जानकार है, वह मनुष्य, स्त्री, तिर्यंच और देवों के स्थिति, गति, वचन को, नृत्य-गान को, शोक आदि को, क्रीड़ा, क्रोध आदि, मौन को, भय, हँसी, बुढ़ापा, रोना, सोना, व्यापार, आकृति, रोग, स्तुति, नमस्कार, पीड़ा, दीनता, दुःख, शंका, भोजन और शृंगार आदि को संसार में नाटक के समान मानता है ।