+ तत्त्व-विदों में श्रेष्ठ का लक्षण -
चक्रींद्रयोः सदसि संस्थितयोः कृपा स्या-
त्तद्भार्ययोरतिगुणान्वितयोर्घृणा च ।
सर्वोत्तमेंद्रियसुखस्मरणेऽतिकष्टं
यस्योद्धचेतसि स तत्त्वविदां वरिष्ठः ॥14॥
जिसके विवेकी चित्त में, सिंहासनस्थ चक्क्री ।
शक्रेश ऊपर दया, बहु गुणवान आकृति में रती ॥
सम पट्टरानी इन्द्र रानी में अरुचि अति श्रेष्ठ भी ।
पंचेन्द्रियों की विषय सामग्री सुखों की याद भी ॥
अति कष्ट कर लगती सदा, वह सदा ही उत्कृष्ट है ।
सब तत्त्वज्ञानी, आत्मज्ञानी, ध्यानिओं में श्रेष्ठ है ॥३.१४॥
अन्वयार्थ : जिस मनुष्य के हृदय में, सभा में सिंहासन पर विराजमान हुये चक्रवर्ती और इन्द्र के ऊपर दया है, शोभा में रति की तुलना करने वाली इन्द्राणी और चक्रवर्ती की पटरानी में घृणा है और जिसे सर्वोत्तम इन्द्रियों के सुखों का स्मरण होते ही अतिकष्ट होता है, वह मनुष्य तत्त्वज्ञानियों में उत्तम तत्त्वज्ञानी कहा जाता है ।