+ क्या मिलने पर क्या अच्छा नहीं लगता -
रम्यं वल्कलपर्णमंदिरकरीरं कांजिकं रामठं
लोहं ग्रावनिषादकुश्रुतमटेद् यावन्न यात्यंबरं ।
सौधं कल्पतरुं सुधां च तुहिनं स्वर्णं मणिं पंचमं
जैनीवाचमहो तथेंद्रियभवं सौख्यं निजात्मोद्भवं ॥15॥
जब तक भवन अमृत मणि, सुरतरु सुवर्ण सुवस्त्र भी ।
पिक-स्वर तुहिन जिनवचन आदि नहीं मिलें तब तक सभी ॥
बक्कल करीर कुशास्त्र पर्ण कुटी पषाण रु हीन भी ।
गर्दभ ध्वनि काँजी रु लोहा, हींग आदि भले ही ॥
लगते तथा आत्मीक सुख, पाया नहीं इस जीव ने ।
तब तक विषय सुख पाँच इन्द्रिय के सुहाते नित रुचें ॥३.१५॥
अन्वयार्थ : जब तक मनुष्य को उत्तमोत्तम वस्त्र, महल, कल्पवृक्ष, अमृत, कपूर, सोना, मणि, पंचमस्वर, जिनेन्द्र भगवान की वाणी और आत्मीक सुख प्राप्त नहीं होते तभी तक वह वक्कल, पत्ते का (सामान्य) घर, करीर (बबूल), कांजी, हींग, लोहा, पत्थर, निषादस्वर, कुशास्त्र और इन्द्रियजन्य सुख को उत्तम और कार्यकारी समझता है; परन्तु उत्तम-वस्त्र आदि के प्राप्त होते ही उसकी वक्कल आदि में सर्वथा घृणा हो जाती है, उनको वह जरा भी मनोहर नहीं मानता।