
केचिद् राजादिवार्तां विषयरतिकलाकीर्तिरैप्राप्तिचिंतां
संतानोद्भूत्युपायं पशुनगविगवां पालवं चान्ससेवां ।
स्वापक्रीडौषधादीन् सुरनरमनसां रंजनं देहपोषं
कुर्वंतोऽस्यंति कालं जगति च विरलाः स्वस्वरूपोपलब्धिं ॥16॥
नित अधिकतर राजादि वार्ता, विषय रति कीर्ति कला ।
पाने की चिन्ता पुत्र प्राप्ति उपाय पशु पालन सदा ॥
बहु वृक्ष पक्षी पोषणादि, अन्य सेवा औषधि ।
सेवन शयन सुर नर, मनोरंजन तनादि पुष्टि ही ॥
इत्यादि करते जगत में, जीवन बिता देते सभी ।
पर स्व स्वरूपोपलब्धि में, जीवन बिताते विरल ही ॥३.१६॥
अन्वयार्थ : संसार में अनेक मनुष्य राजादि के गुणगान कर काल व्यतीत करते हैं। कई एक विषय, रति, कला, कीर्ति और धन की चिन्ता में समय बिताते हैं और सन्तान की उत्पत्ति का उपाय, पशु, वृक्ष, पक्षी, गौ, बैल आदि बहुत से का पालन, अन्य की सेवा, शयन, क्रीड़ा, औषधि आदि का सेवन, देव, मनुष्यों के मन का रंजन और शरीर का पोषण करते-करते अपनी समस्त आयु के काल को समाप्त कर देते हैं इसलिये जिनका समय स्व-स्वरूप शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति में - व्यतीत हो ऐसे मनुष्य संसार में विरले ही हैं ।