+ एक मात्र सदा उपयोग में रहना ही कर्तव्य -
वाचांगेन हृदा शुद्धचिद्रूपोहमिति ब्रुवे ।
सर्वदानुभवामीह स्मरामीति त्रिधा भजे ॥17॥
हूँ शुद्ध चिद्रूपी सदा मैं, वचन तन मन से सतत ।
बोलूँ करूँ वेदन करूँ, स्मरण त्रय नित एक यह ॥३.१७॥
अन्वयार्थ : शुद्धचिद्रूप के विषय में सदा यह विचार करते रहना चाहिये कि 'मैं शुद्धचिद्रूप हूँ' ऐसा मन-वचन-काय से सदा कहता हूँ तथा अनुभव और स्मरण करता हूँ ।