+ क्रियाओं के संबंध में स्याद्वाद शैली -
शुद्धचिद्रूपसद्ध्यानहेतुभूतां क्रियां भजेत् ।
सुधीः कांचिच्च पूर्वं तद्ध्याने सिद्धे तु तां त्यजेत् ॥18॥
सत् शुद्ध चिद्रूप ध्यान हेतुभूत कुछ क्रिया भले ।
पहले करें पर ध्यान सिद्धि बाद विज्ञ उन्हें तजें ॥३.१८॥
अन्वयार्थ : जब तक शुद्धचिद्रूप का ध्यान सिद्ध न हो सके तब तक विद्वान को चाहिये कि उसके कारण रूप क्रिया का अवश्य आश्रय लें; परन्तु उस ध्यान के सिद्ध होते ही उस क्रिया का सर्वथा त्याग कर दे ।