
ज्ञेये दृश्ये यथा स्वे स्वे चित्तं ज्ञातरि दृष्टरि ।
दद्याच्चेन्ना तथा विंदेत्परं ज्ञानं च दर्शनं ॥20॥
पर ज्ञेय दृश्यों में यथा, मन लगाता त्यों लगा ले ।
यदि ज्ञान दर्शन स्वयं में, तो आत्म वेदन नियम से ॥३.२०॥
अन्वयार्थ : मनुष्य जिस प्रकार घट-पट आदि ज्ञेय और दृश्य पदार्थों में अपने चित्त को लगाता है, उसी प्रकार यदि वह शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के लिये ज्ञाता और दृष्टा आत्मा में अपना चित्त लगावे तो उसे स्वस्वरूप का शुद्ध दर्शन और ज्ञान शीघ्र ही प्राप्त हो जाय ॥२०॥