+ शुद्ध-चित्-रूप के इच्छुक की विचार-धारा -
उपायभूतमेवात्र शुद्धचिद्रूपलब्धये ।
यत् किंचित्तत् प्रियं मेऽस्ति तदर्थित्वान्न चापरं ॥21॥
जो शुद्ध चिद्रूप प्राप्ति के, कारण मुझे वे प्रिय सभी ।
मैं शुद्ध चिद्रूपार्थि ही, इसके विरोधी प्रिय नहीं ॥३.२१॥
अन्वयार्थ : शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के इच्छुक मनुष्य को सदा - ऐसा विचार करते रहना चाहिये कि जो पदार्थ शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति में कारण है वह मुझे प्रिय है; क्योंकि मैं शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति का अभिलाषी हूँ और जो पदार्थ उसकी प्राप्ति में कारण नहीं है, उससे मेरा प्रेम भी नहीं है ॥२१॥