
बहिश्चितः पुरः शुद्धचिद्रूपाख्यानकं वृथा ।
अंधस्य नर्त्तनं गानं बधिरस्य यथा भुवि ॥23॥
अंतश्चितः पुरः शुद्धचिद्रूपाख्यानकं हितं ।
बुभुक्षिते पिपासार्त्तेऽन्नं जलं योजितं यथा ॥24॥
ज्यों अन्ध हेतु नृत्य, बहरे हेतु गाना व्यर्थ है ।
त्यों शुद्ध चिद्रूप वार्ता, बहि:वृत्ति हेतु व्यर्थ है ॥३.२३॥
ज्यों क्षुधित को भोजन, तृषित को जल परम हितकर लगे ।
त्यों शुद्ध चिद्रूप वार्ता, अन्तर्मुखी हर्षित करे ॥३.२४॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार अंधे के सामने नाचना और बहिरे के सामने गीत गाना व्यर्थ है, उसी प्रकार बहिरात्मा के सामने शुद्धचिद्रूप की कथा भी कार्यकारी नहीं है; परन्तु जिस प्रकार भूखे के लिये अन्न और प्यासे के लिये जल हितकारी है, उसी प्रकार अन्तरात्मा के सामने कहा गया शुद्धचिद्रूप का उपदेश भी परम हित प्रदान करने वाला है ॥२३-२४॥