
विकल्पजालजंबालान्निर्गतोऽयं सदा सुखी ।
आत्मा तत्र स्थितो दुःखीत्यनुभूय प्रतीयतां ॥12॥
विकल्पमय शेवाल में फंस, दु:ख भोगे नित्य ही ।
तज उन्हें होता आत्मस्थिर, सदा सुख अनुभूति ही ॥४.१२॥
अन्वयार्थ : जब तक यह आत्मा नाना प्रकार के संकल्प विकल्परूपी शेवाल में फंसा रहता है, तब तक यह सदा दुःखी बना रहता है -- क्षण-भर के लिये भी इसे सुख-शांति नहीं मिलती; परन्तु जब इसके संकल्प-विकल्प छूट जाते हैं; उस समय यह सुखी हो जाता है -- निराकुलतामय सुख का अनभव करने लग जाता है, ऐसा स्वानुभव से निश्चय होता है ।