+ आत्मा कर्म से आच्छादित -
स्मृतिमेति यतो नादौ पश्चादायाति किंचिन ।
कर्मोदयविशेषोऽयं ज्ञायते हि चिदात्मनः ॥14॥
विस्फुरेन्मानसे पूर्वं पश्चान्नायाति चेतसि ।
किंचिद्वस्तु विशेषोऽयं कर्मणः किं न बुध्यते ॥15॥
स्मरण करने पर नहीं, तत्काल होती स्मृति ।
पश्चात् कुछ स्मरण चिन्मय के दशा कर्मोदयी ॥४.१४॥
स्मृत हुआ विस्मृत पुन: हो, पुन: स्मृत हो नहीं ।
यह कर्म की ही तीव्रता, यों आत्मा है बँधा ही ॥४.१५॥
अन्वयार्थ : यदि यह चैतन्य-स्वरूप आत्मा किसी पदार्थ का स्मरण करता है तो पहिले वह पदार्थ उसके ध्यान में जल्दी प्रविष्ट नहीं होता; परन्तु एकाग्र हो जब यह बार-बार ध्यान करता है तब उसका कुछ-कुछ स्मरण हो आता है। इसलिये इससे ऐसा जान पड़ता है कि यह आत्मा कर्म से आवृत है। तथा पहिले-पहिले यदि किसी पदार्थ का स्मरण भी हो जाय तो उसके जरा ही विस्मरण हो जाने पर फिर बार-बार स्मरण करने पर भो उसका स्मरण नहीं आता, इसलिये आत्मा पर कर्मों की माया जान पड़ती है अर्थात्‌ आत्मा कर्म के उदय से अवनृत है यह स्पष्ट जान पड़ता है।