
सर्वेषामपि कार्याणां शुद्धचिद्रूपचिंतनं ।
सुखसाध्यं निजाधीनत्वादीहामुत्र सौख्यकृत् ॥16॥
स्वाधीन होने से सभी कार्यों में शुद्ध चिद्रूप का ।
ही ध्यान सहज सुसाध्य, इह पर-लोक सुख साधन सदा ॥४.१६॥
अन्वयार्थ : संसार के समस्त कार्यों में शुद्धचिद्रूप का चिंतन, मनन व ध्यान करना ही सुखसाध्य-सुख से सिद्ध होनेवाला है; क्योंकि यह निजाधीन है। इसकी सिद्धि में अन्य किसी पदार्थ की अपेक्षा नहीं करनी पड़ती और इससे इस लोक और परलोक दोनों लोकों में निराकुलतामय सुख की प्राप्ति होती है ।