प्रोद्यन्मोहाद् थया लक्ष्म्यां कामिन्यां रमते च हृत् ।
तथा यदि स्वचिद्रूपे किं न मुक्तिः समीपगा ॥17॥
ज्यों मोह-वश धन स्त्री आदि में रमता मन सदा ।
त्यों स्वयं के चिद्रूप में रम, शीघ्र ही मुक्ति दशा ॥४.१७॥
अन्वयार्थ : मोह के उदय से मत्त जीव का मन जिस प्रकार संपत्ति और स्त्रियों में रमण करता है, उसीप्रकार यदि वही मन (उनसे उपेक्षा कर) शुद्धचिद्रूप की ओर झुके -- उससे प्रेम करे, तो देखते-देखते ही इस जीव को मोक्ष की प्राप्ति हो जाय ।