+ इस कार्य को नहीं करनेवालों के लिए उलाहना -
विमुच्य शुद्धचिद्रूपचिंतनं ये प्रमादिनः ।
अन्यत् कार्यं च कुर्वंति ते पिबंति सुधां विषं ॥18॥
निज शुद्ध चिद्रूप ध्यान तज, जो प्रमादी अन्य कार्य को ।
करते वे पीते हैं जहर, जिवनार्थ तजकर सुधा को ॥४.१८॥
अन्वयार्थ : जो आलसी मनुष्य सुख-दुःख और उनके कारणों को भले प्रकार जानकर भी प्रमाद के उदय से शुद्ध-चिद्रूप की चिंता छोड़ अन्य कार्य करने लग जाते हैं, वे अमृत को छोड़कर महा दुःखदायी विषपान करते हैं । इसलिये तत्त्वज्ञों को शुद्धचिद्रूप का सदा ध्यान करना चाहिये ।