+ किसका क्या फल है? -
विषयानुभवे दुःखं व्याकुलत्वात् सतां भवेत् ।
निराकुलत्वतः शुद्धचिद्रूपानुभवे सुखं ॥19॥
नित आकुलित हो विषय सेवन में सदा दुख भोगता ।
नित निराकुलता से सुखी, चिद्रूपवेदी भोगता ॥४.१९॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियों के विषय भोगने में जीवों का चित्त सदा व्याकुल बना रहता है, इसलिये उन्हें अनंत क्लेश भोगने पड़ते हैं । शुद्ध-चिद्रूप के अनुभव में किसी प्रकार की आकुलता नहीं होती, इसलिये उसकी प्राप्ति से जीवों का परम कल्याण होता है ।