
रागद्वेषादिजं दुःखं शुद्धचिद्रूपचिंतनात् ।
याति तच्चिंतनं न स्याद् यतस्तद्गमनं विना ॥20॥
नित शुद्ध चिद्रूप ध्यान से, दुख राग द्वेषादिज मिटें ।
वे क्योंकि नष्ट हुए बिना, चिद्रूप ध्यान न हो सके ॥४.२०॥
अन्वयार्थ : राग-द्वेष आदि के कारण से जीवों को अनेक प्रकार के दुःख भोगने पड़ते हैं; परन्तु शुद्धचिद्रूप का स्मरण करते ही वे पलभर में नष्ट हो जाते हैं -- ठहर नहीं सकते; क्योंकि बिना रागादि के दूर हुये शुद्धचिद्रूप का ध्यान ही नहीं हो सकता ।