
आनन्दो जायतेत्यंतः शुद्धचिद्रूपचिंतने ।
निराकुलत्वरूपो हि सतां यत्तन्मयोऽस्त्यसौ ॥21॥
हो शुद्ध चिद्रूप ध्यान में, आनन्द अति ही निराकुल ।
ध्याता को क्योंकि वह सदा, स्व भाव से ही निराकुल ॥४.२१॥
अन्वयार्थ : निराकुलतारूप आनंद है और इस आनंद की प्राप्ति सज्जनों को शुद्धचिद्रूप के ध्यान से ही हो सकती है; क्योंकि यह शुद्धचिद्रूप आनंद-मय है -- आनंदमय पदार्थ इससे भिन्न नहीं है ।