+ उदाहरण पूर्वक कारण के अनुसार कार्य -
तं स्मरन् लभते ना तमन्यदन्यच्च केवलं ।
याति यस्य पथा पांथस्तदेव लभते पुरं ॥22॥
जिस मार्ग चलता पथिक, वह उस नगर को ही प्राप्त हो ।
त्यों आत्मध्यान से आत्मा, धन आदि से धन प्राप्त हो ॥४.२२॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार पथिक मनुष्य जिस गांव के मार्ग को पकडकर चलता है वह उसी गांव में पहुँच जाता है, अन्य गांव के मार्ग से चलनेवाला अन्य गाँव में नहीं। उसीप्रकार जो मनुष्य शुद्धचिद्रूप का स्मरण ध्यान करता है, वह शुद्धचिद्रूप को प्राप्त करता है और जो धन आदि पदार्थों की आराधना करता है, वह उनकी प्राप्ति करता है; परन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि अन्य पदार्थों का ध्यान करे और शुद्ध-चिद्रप को पा जाय ।