
शुद्धचिद्रूपसंप्राप्तिर्दुर्गमा मोहतोंऽगिनां ।
तज्जयेऽत्यंत सुगमा क्रियाकांडविमोचनात् ॥23॥
है मोहियों को महा-दुर्लभ, शुद्ध चिद्रूप भोगना ।
पर मोह-विजयी तपादि बिन भी उसे ही भोगता ॥४.३३॥
अन्वयार्थ : यह मोहनीय कर्म महाबलवान है। जो जीव इसके जाल में जकड़े हैं उन्हें शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति दुःसाध्य है और जिन्होंने इसे जीत लिया है उन्हें तप आदि क्रियाओं के बिना ही सुलभता से शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति हो जाती है ।