
रत्नानामौषधीनां वसनरसरुजामन्नधातूपलानां
स्त्रीभाश्वानां नराणां जलचरवयसां गोमहिष्यादिकानां ।
नामोत्पत्त्यर्घतार्थान् विशदमतितया ज्ञातवान् प्रायशोऽहं
शुद्धचिद्रूपमात्रं कथमहह निजं नैव पूर्वं कदाचित् ॥1॥
सब रत्न औषधि वस्त्र अन्न रोग धातु घृतादि रस ।
पाषाण स्त्री पशु नर, जलचर खगादि गो महिष ॥
इत्यादि बहुविध पदार्थों के, नाम काम प्रयोजन ।
सब प्राप्ति स्थल विशद धी से, ज्ञात प्राय: मुझे सब ॥
ये सभी जानें पूर्व में, पर शुद्ध चिद्रूप मात्र ही ।
जो नित्य आत्मिक स्वयं ही, उसको नहीं जाना कभी ॥५.१॥
अन्वयार्थ : मैंने पहिले कई बार रत्न, औषधि, वस्त्र, घी आदि रस, रोग, अन्न, सोना-चांदी आदि धातु, पाषाण, स्त्री, हस्ती, घोड़े, मनुष्य, मगरमच्छ आदि जल के जीव, पक्षी और गाय-भैंस आदि पदार्थों के नाम, उत्पत्ति, मूल्य और प्रयोजन भले प्रकार अपनी विशद्-बुद्धि से जान-सुन लिये हैं; परन्तु जो निज शुद्धचिद्रूप नित्य है, आत्मिक है -- उसे आज तक कभी पहिले नहीं जाना है ।