
पूर्वं मया कृतान्येव चिंतनान्यप्यनेकशः ।
न कदाचिन्महामोहात् शुद्धचिद्रूपचिंतनं ॥2॥
सब पूर्व में मैंने किया, बहुबार चिन्तन अन्य का ।
पर मोह-वश नहिं कर सका, इक ध्यान शुध चिद्रूप का ॥६.२॥
अन्वयार्थ : पहिले मैंने अनेक बार अनेक पदार्थों का मनन किया है परन्तु पुत्र-स्त्री आदि के मोह से मूढ़ हो, शुद्ध चिद्रूप का कभी आज तक चिंतवन न किया ।