+ मरण-काल में भी इसका स्मरण नहीं किया -
अनंतानि कृतान्येव मरणानि मयापि न ।
कुत्रचिन्मरणे शुद्धचिद्रूपोऽहमिति स्मृतं ॥3॥
मैंने अनन्तों बार मरण, अनन्त भव में हैं किए ।
'मैं शुद्ध चिद्रूप हूँ' नहीं ध्याया मरण के काल में ॥५.३॥
अन्वयार्थ : मैं अनन्त बार अनन्त भवों में मरा; परन्तु मृत्यु के समय 'मैं शुद्धचिद्रूप हूँ' ऐसा स्मरण कर कभी न मरा ।