
सुरद्रुमा निधानानि चिंतारत्नं द्युसद्गवी ।
लब्धा च न परं पूर्वं शुद्धचिद्रूपसंपदा ॥4॥
चिन्तामणि सुरतरु सुरधेनु निधान विविध विभव ।
पाए परन्तु नहीं पाया, शुद्ध चिद्रूपी विभव ॥५.४॥
अन्वयार्थ : मैंने कल्पवृक्ष, खजाने, चिन्तामणि-रत्न और कामधेनु आदि लोकोत्तर अनन्य विभूतियाँ प्राप्त कर लीं; परन्तु अनुपम शुद्धचिद्रूप नाम की संपत्ति आज तक कभी नहीं पाई ।