+ इसी अप्राप्ति पर पुन: खेद -
द्रव्यादिपंचथा पूर्वं परावर्त्ता अनंतशः ।
कुतास्तेष्वेकशो न स्वं स्वरूपं लब्धवानहं ॥5॥
द्रव्यादि पाँचों परावर्तन, किए पूरे अनन्तों ।
पर स्व स्वरूपोपलब्धि की नहिं कभी अत्याश्चर्य हो ॥५.५॥
अन्वयार्थ : मैंने अनादिकाल से इस संसार में परिभ्रमण किया । इसमें द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भाव नामक पांचों परिवर्तन भी अनेक बार पूरे किये; परन्तु स्व-स्वरूप शुद्ध-चिद्रूप की प्राप्ति मुझे आज तक एक बार भी न हुई ।