
इन्द्रादीनां पदं लब्धं पूर्वं विद्याधरेशिनां ।
अनंतशोऽहमिंद्रस्य स्वस्वरूपं न केवलं ॥6॥
पाए अनेकों बार विद्याधरेशों इन्द्रादि के ।
अहमिन्द्र के पद भी परन्तु स्व स्वरूप न पा सके ॥५.६॥
अन्वयार्थ : मैंने पहिले अनेक बार इन्द्र, नृपत्ति आदि उत्तमोत्तम पद भी प्राप्त किये । अनन्तबार विद्याधरों का स्वामी और अहमिन्द्र भी हुआ; परन्तु आत्मिकरूप-शुद्ध-चिदद्रूप का लाभ न कर सका ।