
मध्ये चतुर्गतीनां च बहुशो रिपवो जिताः ।
पूर्वं न मोहप्रत्यर्थी स्वस्वरूपोपलब्धये ॥7॥
बहु बार चारों गति के, बहु रिपु जीते पर नहीं ।
जीता स्वरूपोपलब्धि-घातक, मोह को मैंने कभी ॥५.७॥
अन्वयार्थ : नरक, मनुष्य, तिर्यञ्च और देव -- चारों गतियों में भ्रमणकर मैंने अनेकबार अनेक शत्रुओं को जीता; परन्तु शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के लिये उसके विरोधी महाबलवान मोहरूपी बैरी को कभी नहीं जीता ।