+ शुद्ध चिद्रूप की अस्वीकृति -
मया निःशेषशास्त्राणि व्याकृतानि श्रुतानि च ।
तेभ्यो न शुद्धचिद्रूपं स्वीकृतं तीव्रमोहिना ॥8॥
बहु शास्त्र भी बहुबार समझे, सुने, विश्लेषित किए ।
अति मोह-वश पर नहीं माना, शुद्धरूप वहीं कहे ॥५.८॥
अन्वयार्थ : मैंने संसार में अनंतबार कठिन से कठिन भी संपूर्ण शास्त्रों का व्याख्यान किया, अर्थ किया और बहुत से शास्त्रों का श्रवण भी किया; परन्तु मोह से मूढ़ हो उनमें जो शुद्धचिद्रूप का वर्णन है, उसे कभी स्वीकार न किया ।