
वृद्धसेवा कृता विद्वन्महतां सदसि स्थितः ।
न लब्धं शुद्धचिद्रूपं तत्रापि भ्रमतो निजं ॥9॥
बहु वृद्ध सेवा की, रहा विद्वद सभाओं में सदा ।
घूा वहाँ पर शुद्ध चिद्रूप, को नहीं मैं पा सका ॥५.९॥
अन्वयार्थ : इस संसार में भ्रमण कर मैंने कई बार वृद्धों की सेवा की व विद्वानों की बड़ी-बड़ी सभाओं में भी बैठा; परन्तु अपने निज शुद्धचिद्रूप को कभी मैंने प्राप्त नहीं किया ।