मानुष्यं बहुशो लब्धमार्ये खंडे च सत्कुलं ।
आदिसंहननं शुद्धचिद्रूपं न कदाचन ॥10॥
बहुबार उत्तम संहनन, नर, आर्य खण्ड कुलीन भी ।
हो नहीं पाया शुद्ध चिद्रूप, एक स्वयं स्वभाव ही ॥५.४॥
अन्वयार्थ : मैं आर्य-खंड में बहुतबार मनुष्य हुआ, कई बार उत्तम-कुल में भी जन्म पाया; वज्रवृषभनाराच संहनन भी कई बार पाया; परन्तु शुद्धचिद्रूप की मुझे कभी भी प्राप्ति न हुई ।