
शौचसंयमशीलानि दुर्धराणि तपांसि च ।
शुद्धचिद्रूपसद्ध्यानमंतरा धृतवानहं ॥11॥
बहु बार संयम शौच, दुर्धर तपादि शीलादि भी ।
धारे नहीं ध्याया यही, चिद्रूप शुध बस एक ही ॥५.११॥
अन्वयार्थ : मैंने अनंतबार शौच, संयम व शीलों को धारण किया, भांति-भांति के घोरतम तप भी तपे; परन्तु शुद्धचिद्रूप का कभी ध्यान नहीं किया ।