+ सभी पर्यायों को धारण कर भी इस शुद्ध-चिद्रूप को नहीं जाना -
एकेंद्रियादिजीवेषु पर्यायाः सकला धृताः ।
अजानता स्वचिद्रूपं परस्पर्शादिजानता ॥12॥
इस जीव ने एकेन्द्रियादि, सभी पर्यायें धरीं ।
स्पर्श आदि अन्य के, जाने न जाना चिन्मयी ॥५.१२॥
अन्वयार्थ : मैं अनेक बार एकेंद्रिय, दो-इंद्रिय, ते-इन्द्रिय, चौ-इन्द्रिय और पंचेन्द्रिय हुआ । एकेन्द्रिय आदि में वृक्ष आदि अनंत पर्यायों को धारण किया, दूसरे के स्पर्श, रस, गंध आदि को भी जाना; परन्तु स्व-स्वरूपचिद्रूप को आज तक न पाया, न पहिचाना ।