
ज्ञातं दृष्टं मया सर्वं सचेतनमचेतनं ।
स्वकीयं शुद्धचिद्रूपं न कदाचिच्च केवलं ॥13॥
सब अचेतन चेतन सभी, जाने हैं देखे पर कभी ।
स्वकीय शुद्ध चिद्रूप केवल, एक जाना है नहीं ॥५.१३॥
अन्वयार्थ : मैंने संसार में चेतन-अचेतन समस्त पदार्थों को भले प्रकार देखा-जाना; परन्तु केवल शुद्धचिद्रूप नामक एक पदार्थ को कभी मैंने न जाना न देखा ।