
लोकज्ञाति श्रुतसुरनृपति श्रेयसां भामिनीनां
यत्यादीनां व्यवहृतिमखिलां ज्ञातवान् प्रायशोऽहं ।
क्षेत्रादीनामशकलोजगतो वा स्वभावं च शुद्ध-
चिद्रूपोऽहं ध्रुवमिति न कदा संसृतौ तीव्रमोहात् ॥14॥
सब लोक ज्ञाति शास्त्र सुर, नरपति विभव कल्याण भी ।
मुनि आदि नारी प्रवृत्ति, नदि क्षेत्र पर्वत आदि भी ॥
सम्पूर्ण जगत स्वभाव, अंशों की अनेकों विविधता ।
जानी न जाना मोह से, 'चिद्रूप ध्रुव मैं' यथार्थता ॥५.१४॥
अन्वयार्थ : संसार में लोक, ज्ञाति, शास्त्र, देव और राजाओं की विभूतियों को, कल्याण, स्त्रियों और मुनि आदि के समस्त व्यवहार को कई बार मैंने जाना; क्षेत्र, नदी, पर्वत आदि खंड और समस्त जगत के स्वभाव को भी पहिचाना परन्तु मोह की तीव्रता से 'मैं शुद्धचिद्रूप हूँ' इस बात को मैं निश्चय रूप से कभी न जान पाया ।