
शीतकाले नदीतीरे वर्षाकाले तरोरधः ।
ग्रीष्मे नगशिरोदेशे स्थितो न स्वे चिदात्मनि ॥15॥
अति शीत में सर तीर, तरुतल बहुत वर्षा में रहा ।
अति ग्रीष्म पर्वत चोटिओं पर, नहिं चिदातम में रहा ॥५.१५॥
अन्वयार्थ : बहुत बार मैं शीतकाल में नदी के किनारे, वर्षा-काल में वृक्ष के नीचे और ग्रीष्म-ऋतु में पर्वत की चोटियों पर स्थित हुआ; परन्तु अपने चैतन्य-स्वरूप आत्मा में मैंने कभी स्थिति न की ।