
विहितो विविधोपायैः कायक्लेशो महत्तमः ।
स्वर्गादिकांक्षया शुद्धं स्वस्वरूपमजानता ॥16॥
स्वर्गादि इच्छा से किए, बहुविध प्रयत्नों से महा ।
नित काय क्लेश स्वरूप, शुध चिद्रूप निज नहिं जानता ॥५.१६॥
अन्वयार्थ : 'मुझे स्वर्ग आदि सुख की प्राप्ति हो' इस अभिलाषा से मैंने अनेक प्रयत्नों से घोरतम भी काय-क्लेश तप भी तपे परन्तु शुद्धचिद्रूप की ओर जरा भी ध्यान न दिया - स्वर्ग चक्रवर्ती आदि के सुख के सामने मैंने शुद्धचिद्रूप सुख को तुच्छ समझा ।