
अधीतानि च शास्त्राणि बहुवारमनेकशः ।
मोहतो न कदा शुद्धचिद्रूपप्रतिपादकं ॥17॥
बहुबार बहुविध शास्त्र भी, पढ़ लिए पर अति मोह से ।
'मैं शुद्ध चिद्रूपी' निरूपक, शास्त्र नहीं कभी पढ़े ॥५.१७॥
अन्वयार्थ : मैंने बहुत बार अनेक शास्त्रों को पढ़ा परन्तु मोह से मत्त हो शुद्धचिद्रूप का स्वरूप समझानेवाला एक भी शास्त्र न पढ़ पाया ।