
न गुरुः शुद्धचिद्रूपस्वरूपप्रतिपादकः ।
लब्धो मन्ये कदाचितं विनाऽसौ लभ्यते कथं ॥18॥
स्वरूप चिद्रूप शुद्ध प्रतिपादक गुरु भी नहिं मिले ।
यह मान उनके बिना कैसे, स्व स्वरूप मुझे मिले? ॥५.१८॥
अन्वयार्थ : शुद्धचिद्रूप का स्वरूप प्रतिपादन करनेवाले आज तक मुझे कोई गुरु नहीं मिले और जब गुरु ही कभी नहीं मिले तब शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति हो ही कैसे सकती थी ?