
सचेतने शुभे द्रव्ये कृता प्रीतिरचेतने ।
स्वकीये शुद्धचिद्रूपे न पूर्वं मोहिना मया ॥19॥
अति मोह से चेतन अचेतन, द्रव्य शुभ में प्रीति की ।
स्वकीय चिद्रूप शुद्ध में, पर नहीं प्रीति की कभी ॥५.१९॥
अन्वयार्थ : अतिशय मोही होकर मैंने सजीव व अजीव शुभ-द्रव्यों में प्रीति की, परन्तु आत्मिक शुद्धचिद्रूप में कभी प्रेम न किया ।