
दुष्कराण्यपि कार्याणि हा शुभान्यशुभानि च ।
बहूनि विहितानीह नैव शुद्धात्मचिंतनं ॥20॥
दुष्कर शुभाशुभ कार्य मैंने, किए बहुविध पर कभी ।
नहिं किया शुद्ध चिद्रूप चिन्तन, नहीं उसका ध्यान भी ॥५.२०॥
अन्वयार्थ : इस संसार में मैंने कठिन से कठिन भी शुभ और अशुभ कार्य किये परन्तु आजतक शुद्धचिद्रूप की कभी चिंता न की ।