
पूर्वं या विहिता क्रिया किल महामोहोदयेनाखिल
मूढत्वेन मयेह तत्र महतीं प्रीतिं समातन्वता ।
चिद्रूपाभिरतस्य भाति विषवत् सा मंदमोहस्य मे
सर्वस्मिन्नधुना निरीहमनसोऽतोधिग् विमोहोदयं ॥21॥
हैं महा मोहोदय-वशी हो, महा प्रीतिकर किए ।
मैंने यहाँ सब मूढ़ता से, जहर वत् अब लगें वे॥
चिद्रूप में रत मन्द मोही, सभी में अब निष्पृही ।
इस मोह उदयी दशा को धिक्कारता मन नित्य ही ॥५.२१॥
अन्वयार्थ : सांसारिक बातों में अतिशय प्रीति को करानेवाले मोहनीय कर्म के उदय से मूढ़ बन जो मैंने पहिले समस्त कार्य किये हैं, वे इस समय मुझे विष सरीखे दुःखदायी जान पड़ रहे हैं; क्योंकि इस समय मैं शुद्धचिद्रूप में लीन हो गया हूँ। मेरा मोह मंद हो गया है और सब बात से मेरी इच्छा हट गई है, इसलिये इस मोहनीय कर्म के उदय के लिये सर्वथा धिक्कार है ।