
व्यक्ताव्यक्तविकल्पानां वृंदैरापूरितो भृशं ।
लब्धस्तेनावकाशो न शुद्धचिद्रूप चिंतने ॥22॥
अव्यक्त व्यक्त विकल्प बहुविध से सहित मुझको कभी ।
इस शुद्ध चिद्रूप ध्यान हेतु, समय भी मिलता नहीं ॥५.२२॥
अन्वयार्थ : व्यक्त और अव्यक्त दोनों प्रकार के विकल्पों से मैं सदा भरा रहा, इसलिये आज तक मुझे शुद्धचिद्रूप के चिंतवन करने का कभी भी अवकाश नहीं मिला ।