
जानंति ग्रहिलं हतं ग्रहगणैर्ग्रस्तं पिशाचैरुजा
मग्नं भूरि परीषहैर्विकलतां नीतं जराचेष्टितं ।
मृत्यासन्नतया गतं विकृतितां चेद् भ्रांतिमंतं परे
चिद्रूपोऽहमिति स्मृतिप्रवचनं जानंतु मामंगिनः ॥1॥
सब समझ पागल ग्रह पिशाचों से ग्रसित रोगी विकल ।
बहु परिषहों से जरा युत, आसन्नमरणी ज्ञान बिन ॥
नित भ्रमित सब मानों भले, पर मैं नहीं ऐसा कभी ।
मैं शुद्ध चिद्रूपी श्रुति के, दृढ़ वचन मानूँ यही ॥६.१॥
अन्वयार्थ : चिद्रूप की चिन्ता में लीन मुझे, अनेक मनुष्य बावला, खोटे ग्रहों से और पिशाचों से ग्रस्त, रोगों से पीड़ित, भांति-भांति के परीषहों से विकल, बुड्ढा, बहुत जल्दी मरनेवाला होने के कारण विकृत और ज्ञान-शून्य हो घूमनेवाला जानते हैं सो जानो परन्तु मैं ऐसा नहीं हूँ क्योंकि मुझे इस बात का पूर्ण निश्चय है कि मैं शुद्ध-चित्स्वरूप हूँ ।