
उन्मत्तं भ्रांतियुक्तं गतनयनयुगं दिग्विमूढं च सुप्तं
निश्चिंतं प्राप्तमूर्च्छं जलवहनगतं बालकावस्थमेतत् ।
स्वस्याधीनं कृतं वा ग्रहिलगतिगतं व्याकुलं मोहधूर्त्तैः
सर्वं शुद्धात्मदृग्भीरहितमपि जगद् भाति भेदज्ञचित्ते ॥2॥
भेदज्ञ मन में लगे सब, शुद्धात्म दृष्टि हीन जग ।
उन्मत्त भ्रान्तियुक्त अन्धा दिग्विमूढ़ी बालवत् ॥
हो सुप्त मूर्छित जल प्रवाह, बहे पराधिन बावला ।
मोह धूर्त से व्याकुल सतत, सेवक बना पीड़ित महा ॥६.२॥
अन्वयार्थ : जिस समय स्व और पर का भेद-विज्ञान हो जाता है उस समय शुद्धात्म दृष्टि से रहित यह जगत चित्त में ऐसा जान पड़ने लगता है मानों यह उन्मत्त और भ्रान्त है । इसके दोनों नेत्र बन्द हो गये हैं यह दिग्विमूढ़ हो गया है । गाढ़ निद्रा में सो रहा है । मन रहित असैनी मूर्च्छा से बेहोश और जल के प्रवाह में बहा चला जा रहा है । बालक के समान अज्ञानी है। मोहरूपी धूर्तों ने व्याकुल बना दिया है । बावला और अपना सेवक बना लिया है ।