
स्त्रीणां भर्त्ता बलानां हरय इव धरा भूपतीनां स्ववत्सो
धेनूनां चक्रवाक्या दिनपतिरतुलश्चातकानां घनार्णः ।
कासाराद्यब्धराणाममृतमिव नृणां वा निजौकः सुराणां
वैद्यो रोगातुराणां प्रिय इव हृदि मे शुद्धचिद्रूपनामा ॥3॥
ज्यों सती को नित पति, बलभद्र को हरी भू भूपति ।
स्व वत्स धेनु, मेघ चातक, चक्रवाकों को रवि॥
नित जलचरों को सर मनुज को सुधा सुर को स्वर्ग घर ।
अति रोगिओं को वैद्य, अतिप्रिय मुझ मनस्थ चिद्रूप यह ॥६.३॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार स्त्रियों को अपना स्वामी, बलभद्रों को नारायण, राजाओं को पृथ्वी, गौओं को बछड़े, चकवियों को सूर्य, चातकों को मेघ का जल, जलचर आदि जीवों को तालाब आदि, मनुष्यों को अमृत, देवों को स्वर्ग और रोगियों को वैद्य अधिक प्यारा लगता है उसीप्रकार मुझे शुद्धचिद्रूप का नाम परम प्रिय मालम होता है इसलिये मेरी यह कामना है कि मेरा प्यारा यह शुद्धचिद्रूप सदा मेरे हृदय में विराजमान रहे ।