
शापं वा कलयंति वस्तुहरणं चूर्णं बधं ताडनं
छेदं भेदगदादिहास्यदहनं निदाऽऽपदापीडनं ।
पव्यग्न्यब्ध्यगपंककूपवनभूक्षेपापमानं भयं
केचिच्चेत् कलयंतु शुद्धपरमब्रह्मस्मृतावन्वहं ॥4॥
मैं जब परम ब्रम्ह शुद्ध, चिद्रूप लीन तब कोई नहीं ।
मेरा बुरा कर सके कोई, श्राप वध ताड़न नहीं ॥
वस्तु हरण, भेदन व छेदन, रोग आदि हास्य भी ।
निन्दा विपत्ति कष्ट कोई, वज्र अग्नि जलनिधि ॥
कीचड़ कुँआ वन पर्वतादि फेंक कर अपमान भय ।
पैदा करें पर नहीं कुछ भी बुरा हो चिन्मय स्वयं ॥६.४॥
अन्वयार्थ : जिस समय मैं शुद्धचिद्रूप के चिंतवन में लीन होऊँ उस समय दुष्ट मनुष्य यदि मुझे निरंतर शाप देवें - दो, मेरी चीज चुरायें - चुराओ, मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े करें, ताडें, छेंदें, मेरे रोग उत्पन्न कर हँसी करें, जलावें, निन्दा करें, आपत्ति और पीड़ा करें - करो, सिर पर वज्र डालें - डालो, अग्नि, समुद्र, पर्वत, कीचड़, कुँआ, वन और पृथ्वी पर फेंके - फेंको: अपमान और भय करें - करो, मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं हो सकता ।